Thursday, 11 June 2015

श्री महालक्ष्म्यष्टक स्तोत्रं

!!शुभ प्रभात वंदन दोस्तों ......जय माँ लक्ष्मी !!
श्री महालक्ष्म्यष्टक स्तोत्रं
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इन्द्र उवाच –
नमस्ते‌உस्तु महामाये श्रीपीठे सुरपूजिते ।
शङ्खचक्र गदाहस्ते महालक्ष्मि नमो‌உस्तु ते ॥ 1 ॥
नमस्ते गरुडारूढे डोलासुर भयङ्करि ।
सर्वपापहरे देवि महालक्ष्मि नमो‌உस्तु ते ॥ 2 ॥
सर्वज्ञे सर्ववरदे सर्व दुष्ट भयङ्करि ।
सर्वदुःख हरे देवि महालक्ष्मि नमो‌உस्तु ते ॥ 3 ॥
सिद्धि बुद्धि प्रदे देवि भुक्ति मुक्ति प्रदायिनि ।
मन्त्र मूर्ते सदा देवि महालक्ष्मि नमो‌உस्तु ते ॥ 4 ॥
आद्यन्त रहिते देवि आदिशक्ति महेश्वरि ।
योगज्ञे योग सम्भूते महालक्ष्मि नमो‌உस्तु ते ॥ 5 ॥
स्थूल सूक्ष्म महारौद्रे महाशक्ति महोदरे ।
महा पाप हरे देवि महालक्ष्मि नमो‌உस्तु ते ॥ 6 ॥
पद्मासन स्थिते देवि परब्रह्म स्वरूपिणि ।
परमेशि जगन्मातः महालक्ष्मि नमो‌உस्तु ते ॥ 7 ॥
श्वेताम्बरधरे देवि नानालङ्कार भूषिते ।
जगस्थिते जगन्मातः महालक्ष्मि नमो‌உस्तु ते ॥ 8 ॥
महालक्ष्मष्टकं स्तोत्रं यः पठेद् भक्तिमान् नरः ।
सर्व सिद्धि मवाप्नोति राज्यं प्राप्नोति सर्वदा ॥
एककाले पठेन्नित्यं महापाप विनाशनम् ।
द्विकाल्ं यः पठेन्नित्यं धन धान्य समन्वितः ॥
त्रिकालं यः पठेन्नित्यं महाशत्रु विनाशनम् ।
महालक्ष्मी र्भवेन्-नित्यं प्रसन्ना वरदा शुभा ॥
[इन्त्यकृत श्री महालक्ष्म्यष्टक स्तोत्रं सम्पूर्णम्]

Sunday, 17 May 2015

Shri Shani Dev Jaynti -18th May 2015

सम्पूर्ण सिद्धियों के दाता सभी विघ्नों को नष्ट करने वाले सूर्य पुत्र  ' शनिदेव '।  ग्रहों में सबसे शक्तिशाली ग्रह।  जिनके शीश पर अमूल्य मणियों से बना मुकुट सुशोभित है। जिनके हाथ में चमत्कारिक यन्त्र है। शनिदेव न्यायप्रिय और भक्तो को अभय दान देने वाले हैं। प्रसन्न हो जाएं तो रंक को राजा और क्रोधित हो जाएं तो राजा को रंक भी बना सकते हैं।
इसलिए शनि जयन्ती के दिन हमें काला वस्त्र, लोहा, काली उड़द, सरसों का तेल दान करना चाहिए, तथा धूप, दीप, नैवेद्य, काले पुष्प से इनकी पूजा करनी चाहिए।
 
"शुभ प्रभात वंदन ........... जय शनि देव !!
समस्त पूज्य गुरुजनो , विद्वजनो को प्रणाम,
!!ॐ श्री सद गुरुदेवाये नम: !!
!!ॐ गं गणपतये नम: !!
!!ॐ प्रां प्रीं प्रौं स: श्नेश्चराए नम: !!
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"ॐ निलानज्नम समाभासम रविपुत्रो यमाग्रजम 
छाया मार्तंड संभूतं तम नमामि श्नेश्चरम " 
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ज्योतिष शास्त्र के अनुसार शनि का फ़ल व्यक्ति की जन्म कुंडली के बलवान और निर्बल ग्रह तय करते हैं। मनुष्य हो या देवता एक बार प्रत्येक व्यक्ति को शनि का साक्षात्कार जीवन में अवश्य होता हैं । शनि के प्रकोप को आदर्श और कर्तव्य के प्रतिमूर्ति प्रभु श्रीराम, महाज्ञानी रावण, पाण्डव और उनकी पत्नि द्रोपदी, राजा विक्रमादित्य सभी ने भोगा है। इसिलिए मनुष्य तो क्या देवी देवता भी इनके पराक्रम से घबराते हैं।
कहा जाता है शनिदेव बचपन में बहुत नटखट थे। इनकी अपने भाई बहनों से नही बनती थी। इसीलिये सूर्य ने सभी पुत्रों को बराबर राज्य बांट दिया। इससे शनिदेव खुश नही हुए। वह अकेले ही सारा राज्य चलाना चाहते थे, यही सोचकर उन्होनें ब्रह्माजी की अराधना की। ब्रह्माजी उनकी अराधना से प्रसन्न हुए और उनसे इच्छित वर मांगने के लिए कहा। शनि बोले - मेरी शुभ दृष्टि जिस पर पड़ जाए उसका कल्याण हो जाए तथा जिस पर क्रूर दृष्टि पड़ जाए उसका सर्वनाश हो जाए। ब्रह्मा से वर पाकर शनिदेव ने अपने भाईयों का राजपाट छीन लिया। उनके भाई इस कृत्य से दुखी हो शिवजी की अराधना करने लगे। शिव ने शनि को बुला कर समझाया तुम अपनी शक्ति का सदुपयोग करो। शिवजी ने शनिदेव और उनके भाई यमराज को उनके कार्य सौंपे। यमराज उनके प्राण हरे जिनकी आयु पूरी हो चुकी है, तथा शनि देव मनुष्यों को उनके कर्मो के अनुसार दण्ड़ या पुरस्कार देंगे। शिवजी ने उन्हें यह भी वरदान दिया कि उनकी कुदृष्टि से देवता भी नहीं बच पायेंगे।
माना जाता है रावण के योग बल से बंदी शनिदेव को लंका दहन के समय हनुमान जी ने बंधन मुक्त करवाया था। बंधन मुक्त होने के ऋण से मुक्त होने के लिए शनिदेव ने हनुमान से वर मांगने को कहा। हनुमान जी बोले कलियुग मे मेरी अराधना करने वाले को अशुभ फ़ल नही दोगे। शनि बोले ! ऐसा ही होगा। तभी से जो व्यक्ति हनुमान जी की पूजा करता है, वचनबद्ध होने के कारण शनिदेव अपने प्रकोप को कम करते हैं।
भवदीय 
देवल दुबलिश (ज्योतिषविद )
मेरठ 

Thursday, 22 January 2015

Jai Ganpati Bappa

शुभ प्रभात वंदन  दोस्तों  ....!!
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ॐ गजानन भूत गणधिसेवितम , कपित्थ जम्बूफल चारू भक्षणं
उमा सुतम शोक विनाशकारकं नमामि विघ्नेश्वर पाद पंकजम
वक्र तुंड महाकाय सूर्य कोटि समप्रभ:, निर्विघ्नं कुरु में देव सर्व कार्येशु सर्वदा
!!ॐ गं गणपतये नम:!!